Wednesday, 9 October 2019

प्रवित्ति

प्रवृत्ति, प्रकृति और भक्ति का मार्ग

एक संत नदी में स्नान कर रहे थे। उसी समय एक बिच्छू बार-बार उनके पास आकर उन्हें डंक मार रहा था। संत हर बार उसे अपने हाथ से हटाकर दूर कर देते। यह देखकर उनके शिष्यों ने पूछा, “गुरुदेव, आपने इस बिच्छू को मार क्यों नहीं दिया?”

संत ने शांत भाव से उत्तर दिया, “जब बिच्छू ने अपनी प्रवृत्ति नहीं बदली, तो मैं अपनी प्रवृत्ति क्यों बदलूँ?”

यह छोटी-सी कथा मनुष्य के चरित्र, प्रकृति और आत्मसंयम के विषय में गहरा संदेश देती है। बिच्छू का स्वभाव डंक मारना है। वह अपने मूल स्वभाव के अनुसार कार्य करता है। संत का स्वभाव करुणा, धैर्य और अहिंसा है। इसलिए दूसरे के व्यवहार के कारण उन्होंने अपने सद्गुणों को बदलना स्वीकार नहीं किया।

प्रकृति में प्रत्येक प्राणी अपने मूल स्वभाव और प्रवृत्ति के अनुरूप व्यवहार करता है। कोई प्राणी हिंसक होता है, कोई शांत; कोई संग्रह करता है, कोई त्याग करता है। मनुष्य भी अपनी आदतों, संस्कारों, इच्छाओं और मानसिक प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर कार्य करता है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—का वर्णन करते हैं। ये तीनों गुण मनुष्य के विचारों, इच्छाओं, निर्णयों और कर्मों को प्रभावित करते हैं। सत्त्व ज्ञान, शांति और संतुलन की ओर ले जाता है; रजस् इच्छा, कर्म, महत्वाकांक्षा और अस्थिरता को बढ़ाता है; जबकि तमस् अज्ञान, आलस्य, मोह और जड़ता से संबंधित है।

जब तक मनुष्य इन गुणों के प्रभाव से ऊपर नहीं उठता, तब तक उसका व्यवहार बाहरी परिस्थितियों और आंतरिक प्रवृत्तियों से संचालित होता रहता है। वह क्रोध के उत्तर में क्रोध करता है, अपमान के उत्तर में अपमान करता है और लोभ के कारण अनुचित निर्णय ले सकता है। इस प्रकार वह अपने स्वभाव का स्वामी बनने के बजाय उसका दास बन जाता है।

संत की प्रतिक्रिया इस स्थिति से भिन्न है। बिच्छू अपनी प्रकृति के अनुसार डंक मारता है, लेकिन संत अपनी चेतना और विवेक के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। वे दूसरे की प्रवृत्ति को अपने चरित्र का निर्धारक नहीं बनने देते।

यहाँ भक्ति का महत्व सामने आता है। भक्ति केवल पूजा या प्रार्थना का नाम नहीं है। भक्ति का अर्थ है—अपने अहंकार को ईश्वर के प्रति समर्पित करना, अपने कर्मों को पवित्र बनाना और जीवन में ईश्वर के गुणों को विकसित करना। जब मनुष्य ईश्वर का स्मरण करता है, तब वह धीरे-धीरे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार पर नियंत्रण प्राप्त करना सीखता है।

भक्ति मनुष्य को यह समझ देती है कि सामने वाले का व्यवहार उसकी प्रकृति हो सकता है, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया का चुनाव करना हमारे हाथ में है। इसी विवेक से धैर्य, करुणा, क्षमा और आत्मसंयम का विकास होता है।

इसलिए भक्ति को स्वभाव-परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण मार्ग माना जा सकता है। यह बाहरी परिस्थितियों को तुरंत नहीं बदलती, परंतु मनुष्य की दृष्टि, प्रतिक्रिया और आचरण को बदल देती है। और जब दृष्टि बदलती है, तब जीवन का अनुभव भी बदलने लगता है।

कथा का संदेश यही है कि दूसरों की प्रवृत्ति चाहे जैसी हो, हमें अपने सद्गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए। सच्ची साधना वही है, जिसमें मनुष्य परिस्थितियों से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि विवेक, करुणा और ईश्वर-स्मरण से प्रेरित होकर आचरण करे।

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