Tuesday, 28 April 2020

ईष्या

ईर्ष्या की अग्नि

बहुत तेज वर्षा हो रही थी। आकाश काले बादलों से घिरा था और चारों ओर जलधारा बह रही थी। द्रोणाचार्य अग्नि के समीप बैठे थे। अग्नि की ऊष्मा उन्हें वर्षा की ठंडक से बचा रही थी। उसी समय दुर्योधन वर्षा से बचने के लिए वहाँ आकर रुक गया।

दुर्योधन के चेहरे पर पांडवों के प्रति ईर्ष्या स्पष्ट झलक रही थी। उसके मन में उठते विचारों की बेचैनी उसके मौन और भाव-भंगिमा से दिखाई दे रही थी। द्रोणाचार्य ने उसकी ओर देखा, किंतु तुरंत कुछ नहीं कहा।

कुछ क्षण बाद उन्होंने अग्नि में जल रही लकड़ी की ओर संकेत करते हुए पूछा,
“दुर्योधन, यह जो लकड़ी जल रही है, इसे देख रहे हो?”

दुर्योधन ने चुपचाप अग्नि की ओर देखा।

द्रोणाचार्य ने फिर पूछा,
“जलने के बाद यह लकड़ी क्या बन जाएगी?”

दुर्योधन मौन रहा।

द्रोणाचार्य बोले,
“यह लकड़ी जलकर कोयला बन जाएगी। और जब कोयला भी जलता रहेगा, तो अंततः राख बन जाएगा।”

दुर्योधन ने उनकी ओर देखा। आचार्य के शब्दों में छिपा संकेत अब उसके लिए स्पष्ट होने लगा था। उसे लगा कि द्रोणाचार्य केवल लकड़ी के जलने की बात नहीं कर रहे, बल्कि उसके भीतर जल रही ईर्ष्या की अग्नि की ओर संकेत कर रहे हैं।

ईर्ष्या भी मनुष्य के भीतर इसी प्रकार जलती है। वह पहले विचारों को प्रभावित करती है, फिर व्यवहार को कठोर बनाती है और अंततः उसी व्यक्ति को भीतर से जला देती है, जिसके हृदय में वह उत्पन्न होती है। जिस प्रकार अग्नि लकड़ी को धीरे-धीरे कोयले और फिर राख में बदल देती है, उसी प्रकार ईर्ष्या मनुष्य के विवेक, शांति और संतुलन को नष्ट कर सकती है।

दुर्योधन को अपने मन की स्थिति पर लज्जा हुई। वह वहाँ अधिक देर ठहर नहीं सका। बाहर वर्षा अब भी उसी तीव्रता से हो रही थी, किंतु उसके भीतर की बेचैनी उससे भी अधिक प्रबल हो चुकी थी। वह उसी तेज बारिश में वहाँ से चला गया।

द्रोणाचार्य ने उसे रोकने का प्रयास नहीं किया। कभी-कभी गुरु का संकेत ही पर्याप्त होता है। शिक्षा हमेशा लंबे उपदेशों से नहीं मिलती; एक साधारण दृश्य भी मनुष्य को अपने भीतर झाँकने के लिए विवश कर सकता है।

इस कथा का संदेश यही है कि ईर्ष्या सबसे पहले उसी व्यक्ति को जलाती है, जिसके भीतर वह जन्म लेती है। दूसरों की उन्नति से दुखी होने के बजाय यदि मनुष्य अपने कर्म, अभ्यास और आत्मविकास पर ध्यान दे, तो उसकी ऊर्जा विनाश में नहीं, निर्माण में लग सकती है।

दूसरों को जलाने की इच्छा रखने वाला अंततः स्वयं ही भीतर से जलने लगता है।

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