ईष्या

बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, द्रोणाचार्य अग्नि से समीप बैठे थे, दुर्योधन बारिश से बचने के लिए द्रोणाचार्य के समीप आकर रुक गया, उसके चेहरे पर पांडवो के प्रति ईष्या स्पष्ट झलक रही थी, द्रोणाचार्य बोले दुर्योधन ये जो लकड़ी जल रही है देख रहे हो, जलने के बाद ये क्या हो जाएगी, दुर्योधन चुप रहा, द्रोणाचार्य बोले ये लकड़ी जल कर कोयला बन जाएगी और कोयला जल कर राख बन जाता है,दुर्योधन और शर्मिंदा हो गया उसे वहां ठहरा नही गया, उसी तेज़ बारीश में वह वहा से भाग गया।

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