Sunday, 4 December 2016

वाणी

      

वाणी

वाणी हमारे जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। यह केवल विचारों को व्यक्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व, संस्कार और संबंधों का दर्पण भी है। वाणी हमें फर्श से अर्श तक पहुँचा सकती है और अर्श से फर्श पर भी ला सकती है। एक उचित समय पर बोले गए मधुर शब्द किसी के जीवन में आशा जगा सकते हैं, जबकि असंयमित वचन वर्षों पुराने संबंधों में दरार डाल सकते हैं।

वाणी प्रकृति की एक अनमोल देन है। भारतीय परंपरा में इसे माँ सरस्वती की कृपा माना गया है। मनुष्य अपनी वाणी की वास्तविक कीमत निर्धारित नहीं कर सकता, क्योंकि इसके माध्यम से वह ज्ञान, प्रेम, अनुभव और भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाता है। धन-संपत्ति खरीदी जा सकती है, परंतु वाणी की गरिमा और उसके प्रभाव का कोई बाजार-मूल्य नहीं होता। इसलिए वाणी को केवल बोलने की शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए।

वाणी का बड़ा होना आवश्यक नहीं, लेकिन उसका मर्यादित होना अत्यंत आवश्यक है। ऊँची आवाज, कठोर शब्द या प्रभावशाली भाषण किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाते। वास्तविक महत्व इस बात का है कि हम क्या बोलते हैं, किस प्रकार बोलते हैं और हमारे शब्दों से सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ता है। जब वाणी मर्यादित, मधुर और कोमल होती है, तो वह व्यक्तित्व को चार चाँद लगा देती है।

मधुर वाणी का अर्थ केवल मीठे शब्द बोलना नहीं है। उसमें सत्य, संवेदना और सद्भाव का समावेश होना चाहिए। यदि मधुरता बनावटी हो, तो वह शीघ्र ही अपना प्रभाव खो देती है। सच्ची मधुरता हृदय की विनम्रता से उत्पन्न होती है। ऐसे व्यक्ति की वाणी में विश्वास होता है, क्योंकि उसके शब्द और आचरण में विरोधाभास नहीं होता।

भारतीय चिंतन में वाणी को लक्ष्मी से भी जोड़ा गया है। जहाँ संवाद में सम्मान, सौम्यता और परस्पर समझ होती है, वहाँ कलह कम होती है। और जहाँ कलह का अभाव होता है, वहाँ सुख, शांति और समृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि मधुर वाणी घर-परिवार में सौहार्द बनाए रखने वाली शक्ति है।

वाणी का प्रभाव हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में किसी का एक मधुर वचन मन को शांति दे सकता है। जब हम स्वयं को हारा हुआ महसूस करते हैं, तब उत्साह से भरे शब्द हमारे भीतर फिर से आशा और आत्मविश्वास जगा सकते हैं। प्रोत्साहन देने वाली वाणी व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है।

इसलिए हमें अपनी वाणी का निरंतर ध्यान रखना चाहिए। बोलने से पहले विचार करना, सत्य को मर्यादा के साथ कहना और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना वाणी-साधना का ही एक रूप है।

पुराणों और भारतीय परंपरा में वाणी को पत्नी का दर्जा दिया जाना भी इसी गहरे संबंध का संकेत है। वाणी जीवन की सहचरी है—वह हमारे विचारों को अभिव्यक्ति देती है, हमारे संबंधों को दिशा देती है और हमारे कर्मों के प्रभाव को विस्तृत करती है।

अतः वाणी केवल प्रकृति की देन नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों की पहचान और हमारे जीवन की एक अमूल्य संपत्ति है।

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