Tuesday, 28 April 2020

उन उद्यमियों के लिए जो घाटे में चल रहे है (कर्ण का आत्मबल और जीवन का पुरुषार्थ)

कर्ण का आत्मबल और जीवन का पुरुषार्थ

जब इंद्र ने कर्ण से उसके कवच और कुंडल माँगे, तब कर्ण ने उन्हें दान कर दिया। यह प्रसंग महाभारत में कर्ण के त्याग, दानशीलता और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है। लोकप्रचलित कथाओं में इस प्रसंग को एक प्रेरक संवाद के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है—

“देवराज, आपका धन्यवाद, जो आपने मुझे सामान्य मनुष्यों की श्रेणी में ला दिया। कवच और कुंडल के साथ मैं सामान्य मनुष्यों से भिन्न था।”

इस कथन का भाव यह है कि कर्ण अपनी बाहरी शक्ति के छिन जाने को केवल हानि के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे मनुष्य के रूप में अपने पुरुषार्थ की नई परीक्षा मानता है। उसके लिए वास्तविक शक्ति केवल कवच और कुंडल में नहीं, बल्कि साहस, आत्मसम्मान और कर्म करने की क्षमता में भी निहित थी।

कथा के अनुसार, इंद्र ने कर्ण को इसके बदले एक दिव्य अस्त्र प्रदान किया। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि जीवन में कभी-कभी हमें अपनी किसी बड़ी सुविधा, सुरक्षा या उपलब्धि से वंचित होना पड़ सकता है। लेकिन किसी साधन का चले जाना जीवन की संभावनाओं का समाप्त हो जाना नहीं है। मनुष्य के भीतर अनुभव, ज्ञान, धैर्य और पुनः प्रयास करने की क्षमता बनी रह सकती है।

अतः जीवन में निराशा के क्षण आएँ, तो अपने पुरुषार्थ को छोड़ना नहीं चाहिए। कई बार समस्या हमारी क्षमता में नहीं, बल्कि हमारे आत्मविश्वास, ऊर्जा या परिस्थितियों से उत्पन्न थकान में होती है। ऐसे समय में स्वयं को दोष देने के बजाय अपनी स्थिति को समझना, विश्राम लेना, उचित मार्गदर्शन प्राप्त करना और छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ना अधिक उपयोगी होता है।

प्राचीन भारतीय परंपरा में भी यह विचार मिलता है कि जब राजा या योद्धा कठिनाइयों से घिर जाते थे, तो वे ऋषियों और मुनियों के पास जाकर जीवन के यथार्थ को समझने का प्रयास करते थे। ऋषि उन्हें केवल बाहरी विजय का मार्ग नहीं बताते थे, बल्कि आत्मसंयम, विवेक, धर्म और कर्तव्य का बोध भी कराते थे। इस प्रकार सत्संग और मार्गदर्शन मनुष्य को अपने भीतर की शक्ति पहचानने में सहायता करते थे।

आज भी जीवन में ऐसे मार्गदर्शक, गुरु, मित्र या विश्वसनीय व्यक्ति उपयोगी हो सकते हैं, जो हमें अपनी स्थिति को नए दृष्टिकोण से देखने में सहायता करें। आध्यात्मिक मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता दोनों के अपने-अपने महत्व हैं। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक निराशा, अत्यधिक तनाव या जीवन के प्रति उदासीनता अनुभव कर रहा हो, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना भी आवश्यक हो सकता है। आध्यात्मिकता और चिकित्सा को एक-दूसरे का विरोधी मानना उचित नहीं; दोनों अलग-अलग प्रकार से सहायक हो सकते हैं।

सत्संग, प्रार्थना, ध्यान, सकारात्मक संगति और नियमित कर्म मन को स्थिर करने में सहायता कर सकते हैं। लेकिन आशावाद का अर्थ कठिनाइयों को नकारना नहीं, बल्कि कठिनाइयों के बीच भी आगे बढ़ने की संभावना को जीवित रखना है।

कर्ण का प्रसंग हमें यह प्रेरणा देता है कि बाहरी साधनों से अधिक महत्वपूर्ण हमारा आंतरिक संबल है। साधन छिन सकते हैं, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन अनुभव, विवेक और पुरुषार्थ के आधार पर मनुष्य फिर से अपना मार्ग बना सकता है।

इसलिए जीवन में निराशा के क्षणों में स्वयं से कहिए—
“मेरे पास अनुभव है, मेरे भीतर सीखने की क्षमता है, और मैं फिर से प्रयास कर सकता हूँ।”

सत्संग कीजिए, उचित मार्गदर्शन लीजिए, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए और अपने उद्यम में निरंतर लगे रहिए। सफलता का समय निश्चित नहीं होता, लेकिन निरंतर प्रयास जीवन को नई दिशा दे सकता है।

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Friday, 9 December 2016

सफलता के रास्ते


सफलता के रास्ते

सफलता के जुनून में हम इतने अंधे हो चले,
भूल गए जिन रास्तों ने हमें मंजिल तक पहुँचाई।
पता रहता कि हर रोज सिखाती हैं ये राहें,
तो ऐसी जुर्रत कभी न करता।
पर क्या करता, कामयाबी की उमंग में अंधा हो चला था।

सफलता मनुष्य के जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह हमारे परिश्रम, संघर्ष, धैर्य और निरंतर प्रयास का परिणाम होती है। लेकिन कभी-कभी सफलता का आकर्षण इतना बढ़ जाता है कि हम उन रास्तों को ही भूलने लगते हैं, जिन्होंने हमें वहाँ तक पहुँचाया। हम मंजिल को अपना अधिकार समझ लेते हैं और यात्रा के महत्व को कम आँकने लगते हैं।

जो रास्ते हमें मंजिल तक लेकर चले हैं, उन्हें कभी ध्वस्त नहीं करना चाहिए। ये रास्ते केवल भौतिक मार्ग नहीं होते; इनमें हमारे अनुभव, संघर्ष, असफलताएँ, सीख और स्मृतियाँ भी समाहित होती हैं। अक्सर यही रास्ते हमारे जीवन में नित्य नए आयाम गढ़ते हैं। वे हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाते हैं और हमारे भीतर धैर्य, विवेक तथा आत्मविश्वास का निर्माण करते हैं।

रास्ते हमें हमारे गुजरे हुए कल की याद दिलाते हैं। वे बताते हैं कि हम कहाँ से चले थे, किन कठिनाइयों का सामना किया था और किन लोगों ने हमारी यात्रा में हमारा साथ दिया था। वे हमारे वजूद की याद दिलाते हैं। जब हम अपनी उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचते हैं, तब भी हमारी पहचान केवल वर्तमान सफलता से नहीं बनती; उसमें हमारे अतीत का संघर्ष और हमारी यात्रा का योगदान भी शामिल होता है।

अक्सर जब हम कामयाब होते हैं, तब प्रशंसा हमें दीमक की तरह भीतर से खाने लगती है। प्रशंसा स्वयं बुरी नहीं है, लेकिन जब हम उसमें खो जाते हैं, तो आत्ममूल्यांकन की क्षमता कम हो सकती है। हम अपनी कमियों को देखना बंद कर देते हैं और अपने लक्ष्य से भटकने लगते हैं। सफलता के साथ मिलने वाला सम्मान यदि विनम्रता से न सँभाला जाए, तो वही सम्मान अहंकार का कारण बन सकता है।

इसलिए सफलता के बाद भी हमें अपने रास्तों और उन लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने हमारी यात्रा को संभव बनाया। जिनसे हमने सीखा, जिन्होंने हमें प्रोत्साहित किया, जिन्होंने कठिन समय में हमारा साथ दिया—उनके प्रति कृतज्ञता केवल एक नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व की परिपक्वता का प्रमाण है।

यह भी संभव है कि हमें जीवन के किसी अगले चरण में उन्हीं लोगों के अनुभव, सहयोग या मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़े। कोई भी व्यक्ति पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं होता। जीवन की यात्रा में संबंध, अनुभव और सीख निरंतर हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं।

अतः सफलता का वास्तविक अर्थ केवल मंजिल तक पहुँचना नहीं, बल्कि उन रास्तों का सम्मान करना भी है, जिन्होंने हमें वहाँ तक पहुँचाया। मंजिल हमें पहचान दे सकती है, लेकिन रास्ते हमें वह बनाते हैं जो हम वास्तव में हैं।

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Monday, 5 December 2016

मां, ममता और मै

                         मां, ममता और मै

भाव और  भावनाओ के तत्व को मैं भली भांति समझ चुका था ।  भावनाओं से मैं परे जाना चाहता था पर ममता मेरी विवस्ता थी और माँ एक मात्र सहारा। ममता से मैं हर बार हार जाता पर माँ मुझे अपने से कभी हारने नही देती। हारने देती भी किउ।
                           मैं जब भी  भावनाओं से परे जाने की कोशिस करता ममता मेरी कमजोरी बंन जाती।मैं जब भी कठिन फैसला लेता ममता मेरी विवशता बन जाती और उसे रोकने की प्रयास करती। माँ से तो मैं लड़ता था पर ममता से ऐसा नही कर सकता था क्योकि ममता मुझे असवस्थ समझती थी।
                              शायद ममता का कोई कर्ज था जो मां कहती थी चुकता कर दो।और इसीलिए मैं विवश होकर उसे निगल लेता था। ममता के कारण मैंने अनेको परेशानिया झेले और मां इसे भली भाति जानती है।
                     जिंदगी के सबसे कठिन दौर मे जब मुझे किसी की ममता की जरूरत थी तब सिर्फ माँ ने ही सहारा दिया था। ममता पुण्य को खा जाती है। और मेरे आद्यात्मिक जीवन मे ममता ही मेरी सबसे बड़ी बाधा थी। अगर ममता ने साथ दि होती तो मैं आज आध्यात्मिक जीवन के शिखर पर होता। ममता मुझे भोग के तरफ ले जाना चाहती थी। पर शायद माँ मूझसे अलग नही रह सकती थी।
                    कुछ लोगो से मैं मित्रता करने की कोशिश की पर विफलताएँ हाथ लगी पर आज जब पीछे मुड कर देखता हु तो मां का फैसला सही लगता है। क्योकि वो सब के सब स्वार्थी थे।  ममता कहती थी कुछ लोग से दोस्ती करने के लिए पर माँ कभी रजामंद नही थी। और वो सही थी।
                            कहते है माँ सौ गुरु के बराबर होती है। माँ ने सब कुछ सिखाया पर ममता से विजयी होना नही। और हकीकत मे  मैं ममता से जितना भी नही चाहता था। भला जीत कर क्या करता, मुझे पता था जिस दिन मैं घर छोड़ूंगा ममता खुद को हारी हुई महसूस करेगी। मैं ममता से मुक्त होना चाहता हु विजयी होना कतई नही।
                        "कुपुत्रो जाएत क्वचिदपि कुमाता ना भवति" संसार मे कुपुत्र तो हुए है पर माता कभी कुमाता नही होती। मनुष्य सभी ऋण चुका सकता है पर माता का कभी नही। बस यही विनती है ऊससे की जो मुझे निस्वार्थ भाव से चाहता हो और जिससे मै प्रेम करु अर्थार्थ जहा भी निस्वार्थ भाव से प्रेम हो वैसे लोगो से मेरे संबंध जीवन के आखिरी छन तक बनी रहे। 

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