मां, ममता और मै

भाव और  भावनाओ के तत्व को मैं भली भांति समझ चुका था ।  भावनाओं से मैं परे जाना चाहता था पर ममता मेरी विवस्ता थी और माँ एक मात्र सहारा। ममता से मैं हर बार हार जाता पर माँ मुझे अपने से कभी हारने नही देती। हारने देती भी किउ।
                           मैं जब भी  भावनाओं से परे जाने की कोशिस करता ममता मेरी कमजोरी बंन जाती।मैं जब भी कठिन फैसला लेता ममता मेरी विवशता बन जाती और उसे रोकने की प्रयास करती। माँ से तो मैं लड़ता था पर ममता से ऐसा नही कर सकता था क्योकि ममता मुझे असवस्थ समझती थी।
                              शायद ममता का कोई कर्ज था जो मां कहती थी चुकता कर दो।और इसीलिए मैं विवश होकर उसे निगल लेता था। ममता के कारण मैंने अनेको परेशानिया झेले और मां इसे भली भाति जानती है।
                     जिंदगी के सबसे कठिन दौर मे जब मुझे किसी की ममता की जरूरत थी तब सिर्फ माँ ने ही सहारा दिया था। ममता पुण्य को खा जाती है। और मेरे आद्यात्मिक जीवन मे ममता ही मेरी सबसे बड़ी बाधा थी। अगर ममता ने साथ दि होती तो मैं आज आध्यात्मिक जीवन के शिखर पर होता। ममता मुझे भोग के तरफ ले जाना चाहती थी। पर शायद माँ मूझसे अलग नही रह सकती थी।
                    कुछ लोगो से मैं मित्रता करने की कोशिश की पर विफलताएँ हाथ लगी पर आज जब पीछे मुड कर देखता हु तो मां का फैसला सही लगता है। क्योकि वो सब के सब स्वार्थी थे।  ममता कहती थी कुछ लोग से दोस्ती करने के लिए पर माँ कभी रजामंद नही थी। और वो सही थी।
                            कहते है माँ सौ गुरु के बराबर होती है। माँ ने सब कुछ सिखाया पर ममता से विजयी होना नही। और हकीकत मे  मैं ममता से जितना भी नही चाहता था। भला जीत कर क्या करता, मुझे पता था जिस दिन मैं घर छोड़ूंगा ममता खुद को हारी हुई महसूस करेगी। मैं ममता से मुक्त होना चाहता हु विजयी होना कतई नही।
                        "कुपुत्रो जाएत क्वचिदपि कुमाता ना भवति" संसार मे कुपुत्र तो हुए है पर माता कभी कुमाता नही होती। मनुष्य सभी ऋण चुका सकता है पर माता का कभी नही। बस यही विनती है ऊससे की जो मुझे निस्वार्थ भाव से चाहता हो और जिससे मै प्रेम करु अर्थार्थ जहा भी निस्वार्थ भाव से प्रेम हो वैसे लोगो से मेरे संबंध जीवन के आखिरी छन तक बनी रहे। 

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